क्या संख्याओं से पाओगी तुम
नए साल में नया क्या देखोगी तुम ?
घूरती भूकी नंगी आँखों से
खुद को क्या बचा पाओगी तुम ?
कश्मीर, छत्तीसगढ़ या फिर हो उत्तरपूर्व
अपनी स्थिति में क्या अंतर चाहोगी तुम ?
अवसाद नहीं यह चेतावनी है
बच सकीं तो बचोगी तुम !
समाज के ठेकेदार जो भी कहें
क्या खुद अपनी सोच बदल पाओगी तुम ?
अपनी सखी , रिश्तेदार या पडोसी को
बिना आंके , परखे रह पाओगी तुम ?
देवी की पूज्य प्रतिमा से बाहर निकल
सामान्य जीवन क्या जी पाओगी तुम?
बहिन, माँ बेटी और पत्नी की रटी रटाई
भूमिका के परे कुछ नया सोच पाओगी तुम ?
तुम जैसी हो , अच्छी हो , खुल के जीना
यह सोच अपनी बेटी को दे पाओगी तुम?
कोई मसीहा तुमको बचाने नहीं आएगा
खुद को क्या यह समझा पाओगी तुम?
नए बीजमंत्र से कर सकीं
नए साल का स्वागत तो ठीक
नहीं तो सिर्फ संख्याओं में ही
जूझती उलझती रह जाओगी तुम !!

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