Monday, December 31, 2012

नए साल का स्वागत !!


क्या  संख्याओं से पाओगी तुम 
नए साल में नया क्या देखोगी तुम ?
 घूरती भूकी नंगी आँखों से 
खुद को क्या बचा पाओगी तुम ?

कश्मीर, छत्तीसगढ़ या फिर हो उत्तरपूर्व 
अपनी स्थिति में क्या अंतर चाहोगी तुम ?
अवसाद नहीं यह चेतावनी है 
बच सकीं तो बचोगी तुम !

समाज के ठेकेदार जो भी कहें 
क्या खुद अपनी सोच बदल पाओगी तुम ?
अपनी सखी , रिश्तेदार या पडोसी को 
बिना आंके , परखे रह पाओगी तुम ?

देवी की पूज्य प्रतिमा से बाहर निकल 
सामान्य जीवन क्या जी पाओगी तुम?
बहिन, माँ बेटी और पत्नी की रटी रटाई 
भूमिका के परे कुछ नया सोच पाओगी तुम ?

तुम जैसी हो , अच्छी हो , खुल के जीना 
यह सोच अपनी बेटी को दे पाओगी तुम?
कोई मसीहा तुमको बचाने  नहीं आएगा 
खुद को क्या यह समझा  पाओगी तुम?

नए बीजमंत्र से कर सकीं 
नए साल का स्वागत तो ठीक 
नहीं तो सिर्फ संख्याओं में ही 
जूझती उलझती रह जाओगी तुम !!

Thursday, January 26, 2012

यह भी सही


अपनी मर्ज़ी से वह  आगे बढ़ गया 
और मैं खड़ी देखती रह गयी 
कहा कुछ नहीं, सुना कुछ नहीं
बस उम्मीद तरसती सी रह गयी 

एक बार तो पीछे मुड़ के देखा होता 
एक झूठी  मुस्कान ही फेंक दी होती 
मैं थी कौन, जो साथ तेरे चल देती 
माँगा क्या था , जो तुझसे मैं ले लेती 

वादा न कल था न आज है कोई 
न ही संग तेरे जीने की खवाहिश 
गयी रात के संग वह बात भी गयी 
डह गयी वह एक, जो ईमारत थी कोई