अपनी मर्ज़ी से वह आगे बढ़ गया
और मैं खड़ी देखती रह गयी
कहा कुछ नहीं, सुना कुछ नहीं
बस उम्मीद तरसती सी रह गयी
एक बार तो पीछे मुड़ के देखा होता
एक झूठी मुस्कान ही फेंक दी होती
मैं थी कौन, जो साथ तेरे चल देती
माँगा क्या था , जो तुझसे मैं ले लेती
वादा न कल था न आज है कोई
न ही संग तेरे जीने की खवाहिश
गयी रात के संग वह बात भी गयी
डह गयी वह एक, जो ईमारत थी कोई